dreamer

dreamer

Monday, November 30, 2020

 

ख़्वाब और सच्चाई

(A La Kumar Vishwas)



कोई ख़्वाबों में जीता है कोई सपनों को रोता है

कोई आँसू बहाता है तो कोई मुस्कुराता है

ना जाने किस तरह दुनिया का मेला है यहाँ सजता

कभी बिछड़े हुए मिलते कभी कोई छूट जाता है



जो सोचोगे तो समझोगे जो समझोगे तो जानोगे

ज़िंदगी एक फ़ानी है यही हम सबकी कहानी है

तुम्हारे महल चौबारे यहीं रह जाएँगे प्यारे

(This line is copied from My fav poet Shailendraji’s song as a tribute 🙏 )

जो ख़ाली हाथ आया था वो ख़ाली हाथ जाता है



यूँ होता फिर तो क्या होता ये ना सोचो तो अच्छा है

पकड़ के राह तू अपनी चला चल चल, चला चल चल

कभी जो राह में तुझको दिखे ना कारवाँ अपना

अकेला चल चला चल चल कि मंज़िल तुझे बुलाता है



तुम्हारी नस्ल से वाक़िफ़ तुम्हारी जात मैं समझूँ

तुम्हारे पुरकशिश आग़ाज़ का अंजाम भी समझूँ

लिफ़ाफ़ा देखकर ख़त का मज़मून भी समझता हूँ

तुम्हारे बग़ल में छुरी है मुँह में ‘राम’ रहता है



-नारायण गौतम

कलकत्ता, ०२.१०.२०२०

 

Sunday, August 23, 2015

.... बातों से मिलकर बातें!


.... बातों से मिलकर बातें!
इन्ने कहा उन्ने सुना
बातों का बुना इक ताना
सिलसिलों का बना बहाना
बातों से मिलकर बातें-बन जाता है अफ़साना
सांसो के जमावडे में
ज़िंदगी का टिमटिमाना
रुकने की चाह में
सफ़र में बनता है आशियाना
.... बातों से मिलकर बातें-बन जाता है अफ़साना
दर्द ढूंडते है शब्द
शब्द ढूंडते है मतलब
बातों की ठक ठका हट से
रास्ता खोजता रहता हूँ
जैसे एक खोजी हो गया हूँ मैं
ढूंडता ज़िंदगी का ख़ज़ाना
.... बातों से मिलकर बातें-बन जाता है अफ़साना
जो आज है वो कल बन जाता है
जो कल आएगा वो परसो'
बनाता है ऐसे ही
अब्स्ट्रक्ट पेंटिंग कोई picasso की तरह - मेरी ज़िंदगी का
मैं भी घुलता जाता हूँ धीरे-धीरे
जैसे रंग कोई पुराना
.... बातों से मिलकर बातें-बन जाता है अफ़साना


-नारायण गौतम,
5 मार्च,2015 (होली)…9.20 a .m, calcutta


चलन
मैं सीधी लकीर पे चलता हूँ
हवा सा भी मचलता हूँ
सर उठाकर मैं मिलता हूँ
बुरा-अच्छा , खारा-मीठा जैसा भी स्वाद हो
अंजुली में भर जीवन पीता हूँ
मैं सीधी लकीर पे चलता हूँ....
ज़िंदगी के दिये कर्मों पर
उम्मीद की राह बनाता हूँ
पर ना दुखी ना सुखी होता हूँ
एक सफर में हूँ - मैं मुसाफ़िर
बस यही सोच चलता हूँ
मैं सीधी लकीर पे चलता हूँ....
राह अगर चौड़ी है एक किनारे चलता हूँ
साथ चलने का हौंसला भी देता हूँ
आगे बढ़ जाए कोई अगर
अपनी राह पकड़ मैं चलता हूँ
ना दौड़ता हूँ ना फ़िसलता हूँ
मैं सीधी लकीर पे चलता हूँ....
ना छलता हूँ
ना छले जाने का ग़म करता हूँ
ना मिले फूल तो कांटो से दोस्ती करता हूँ
कटता हूँ, छिलता हूँ फिर फूल की ख़्वाहिश करता हूँ
मैं सीधी लकीर पे चलता हूँ....

-नारायण गौतम, 2 मार्च 2015