dreamer

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Wednesday, August 15, 2012

mud ke dekha toh pairon ke nishan mit chukey they


Mud ke dekha toh paya pairon ke nishan mit chukey they

magar ret pe chalney ka shauq aaj bhi hai mujhey.

Main aaj bhhi chal raha hoon kal bhi chal raha tha

.......shayad kal bhi chalunga

lehrein ayengi toh lehren jayengi bhi

bhigengey paer toh bhigega mann bhi

toh ruk mat raahi tu bas chala chal

chahey ret mein...... ya mann mein.

26th Sept-2011

12.10 a.m


LAKEREIN (Lines on faces)


लकीरें

देखा लकीरें पडने लगी है चेहरे पर

आइने में मुँह को थोडा सा दाहिनी ओर घुमाया

लकीरें फिर भी दिख रही थी

थोडा गालों को फुलाया -लकीरें बरक़रार

कुछ सूझा - सो लकीर के एक कोने को पकड़कर पीछे बढने लगा

रास्ता जाना पहचाना लग रहा था, पड़ाव भी परिचित से लगे

थोड़ी दूर जाते ही -ज्यादा दूर नहीं बिलकुल क़रीब

देखा जवानी खड़ी है एक पेड़ की छांह में

ऐसा लग रहा था मानो अभी-अभी मुझसे रूठ के हाथ छुड़ाकर गयी है

मेरी हथेली अभी भी भी गर्म थी उसकी पकड़ से

उसकी आगोश की गर्माहट अभी भी सीने में महसूस कर सकता हूँ

मैने पूछा क्या बात थी मुझे छोड़कर इतनी जल्दी जाने की

बोली कुछ नहीं- मैने थोडा और टटोला तो बोली

ज़ल्दी? पूरे बीस साल तड़पती रही

मैं जब तेरे सिरहाने पे थी तो तुम किसी और के सपने में गुम थे

तुम्हें दुनियाँ जीतने की फ़िक्र थी

मुझे तुम्हें पाने की

मैं सिमटकर तुम्हें बाँहों में लेना चाहती

और तुम ख्यालों में किसी और के रहते

तुम तुम होते और मैं तुम्हें तुम में ढूँढने की नाकामयाब कोशीश करती रही

मैं देखती तुम एक के बाद एक ख्वाब बुन रहे हो

मैं सिर्फ तुम्हारे ख्वाब की कहानी सुनती रही

और मैं आहिस्ता-आहिस्ता बढती आई या तुम मुझसे आगे बढते गए-पता नहीं

तुम्हें पता भी चला-तुम गुम थे ज़िन्दगी बनाने के ख्वाब में

तुम्हे लगा की तुमने वो पाया जिसकी तुम्हे तलाश थी

मुझे लगा की तुमने खोया जिसकी तुम्हे ज़रुरत थी

और यह लकीरें तुम जो देख रहे हो

वो ज़िन्दगी की सलवटें हैं

जो तुमने

ख्वाब देखते हुए वक़्त की चादर में करवट ले कर मुझसे मुँह फेरा था

मैं खामोश होकर अपना सा मूंह लेकर रह गया

आज ये लकीरें मुझसे कुछ कह गयी !

-नारायण गौतम

कलकत्ता ,१५ अगस्त २०१२

(11 .55 p.m)


Sunday, July 22, 2012

maut ek kavita

मौत तू एक कविता है ,मुझसे एक कविता का वादा है
मिलेगी मुझको -डूबती नब्जों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद उफक तक पहुंचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा हो, न उजाला हो
न आधी रात , न दिन
जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को सांस आए
मुझसे एक कविता का वादा है-मिलेगी मुझको I
...गुलज़ार , फ़िल्म- आनंद

Saturday, April 28, 2012

' चोर  '

चुराकर रेस्तोरां में मैने सिर्फ तुम्हे सिर्फ चूमा भर नहीं था
ज़िन्दगी से कुछ  लम्हें चुराएँ  थे
मेरी जगह किसी और के नाम तुमने कर दिए थे जो सालों-साल
उन सालों से बचे-कुचे कुछ पल चुराएँ थे
और चुराएँ थे वो लम्हें
जिन्हें  वक़्त की खामोश अंतराल  में शायद जो तुमने मेरे लिए छोड़ रखा था
 मेरे इंतजार में !
तुम्हे मालूम था कि मैं तुम्हारे कल का इक लम्हा बनकर आऊंगा
और फिर चुपके से तुम्हारे खामोश-लम्हें में समा जाऊंगा
समा जाऊंगा मैं तुममे बनकर ऐसा लम्हा
जिसे तुम न छुपा सकोगी और न हि  दिखा
सिर्फ हर रोज़ महसूस करोगी !
कभी-कभी सोचता हूँ
न जाने तुमने आँखों के कैनवस में
काजल से यह किसकी इक एबसट्रयाक्ट तस्वीर सालों-साल से बनाने की कोशिश की है
तस्वीर भी ऐसी कि सब धुंधला सा दीखता है
मगर तुम हो कि रंगती ही जा रही हो,
रंगती ही जा रही हो उस इमरोज़* की तरह
जिसने अमृता को अपनी ज़िन्दगी कि तस्वीर बना ली थी
मैने तुम्हारे उन्हीं रंगों में से कुछ रंग चुराए हैं
और हम दोनों कि तस्वीर को रँगा है
ज़िन्दगी की इस नयी तस्वीर में मैं हूँ तुम्हारे साथ !

तुम किसके लिए क्या थी या अब क्या हो
न जानता हूँ न जानने की ख्वाहिश है
सिर्फ जानता हूँ तुम मेरे लिए क्या हो और मैं क्या हूँ तेरे लिए  अब
तुम्हें भी मेरे इस एहसास का एहसास है ये मुझे भी है मालूम
महसूस करता हूँ जब 
 मैं और तुम 'हम' बनते हैं कभी-कभी
जब सिर्फ बदन की खुशबू  हमारे दरम्याँ रहती है
जब सन्नाटा बोलता है तुम्हारी डूबने की सिसकियों में
और जब मैं खो जाता हूँ तुम्हें पाकर
न महसूसती मुझे तुम तो
न लिखती हवाओं में मेरा नाम
न बारिश में घुटने तक साड़ी खींचे और मुँह में पल्लू दबाये
मुझसे  भीगने के लिए भीगती हुई चली आती
और न दिसंबर की कांपती सर्दी में
मुझसे जुड़कर पसीने में भीग जाती

चुराएँ हैं कुछ गर्मियों की दोपहरी
जब धूप से लड़कर
मेरे बुलाने पर अपने साथ
सिर्फ माथे का पसीना लेकर आई थी तुम
चाहता हूँ तुम्हे बार-बार बुलाऊँ  इसी तरह
और मैं उस माथे के पसीने को चुराकर और फिर जोड़कर बनाऊं एक माला
जो रहे हमेशा तेरे दिल के पास
तेरे दिल के पास सुनूँ तेरी धड़कन
और तेरे सीने पे सर रखकर अपना नाम सुनता रहूँ ताउम्र
इसलिए चुराएँ थे मैंने  तेरे वो कैन्वस के रंग , वो बारिश, वो दोपहरी , वो पसीना और वो  कुछ लम्हें
क्या मैं चोर हूँ?

नारायण गौतम ,कलकत्ता/kathmandu
२८ अप्रैल २०१२








Monday, April 18, 2011

Be My River - Nepali Poem

तिमी मेरो खोला बनी देऊ

तिमी मेरो खोला बनी देऊ
जसमा बगेर मो आफ्नु जीवन को
दुख सुख दुवै बगाएर लान्छु

बगाएर लानेछु तिम्रो पनि दुख-सुख
तिम्रो बेदना अनि बगाउने छु तिम्रो र मेरो टाडापन
असत्य लाई पनि न छोडी बगाउने छु मो
आफ्नु अभाव लाई आफ्नु स्वभाव लाई पनि

खोला जस्तै विस्तिर्ण होई देउ
खोला जस्तै आफ्नु छेउ-छाउ बस्ती बन्नु देउ
सभ्यता उम्रिनु देउ आफ्नु वरी-परि
यस दुषित वातावरण लाई स्वच्छ र चिसो बतास देउ
जसमा लहरिने छ हाम्रो माया

आमा ले खोला मा पैसा फालेको जस्तै
तिमि मेरो विस्वास बनि देउ
विस्वास कि मलाई तिमीले वारि न राखिकन पारि पुर्याई दिने छौ
डुंगा मा बसेको बेला आफ्नु थप्केली ले मलाई अगाडी बडाउने छौ

मो तिम्रो किनारामा कुनै ढुंगा मा बसेर खुट्टा भिजाउने छु तिमि मा
तिम्रो शीतल स्पर्श महशुश गर्ने छु दिन का दिनै
रात का रातै
तिर्खा लाग्दा तिमि मा गएर प्यास मेटाउने छु
भोख लाग्दा तिमीले दिएको माछा खाउँला

यदि बाटो मा जाँदा जाँदा कुनै बाधा आएमा
तिमि रौद्र रुप लिई सपै बगाएर लैजाऊ
मलाई पनि लगे झन् राम्रो
कम से कम तिमि संग बिछुडिने भय त समाप्त हुने छ
त्येसैले तिमि मेरो खोला बनि देउ
जसमा बगेर मो आफ्नु जीवन को
दुख सुख दुवै बगाएर लान्छु

-नारायण गौतम
कलकत्ता, ४ अप्रिल २०११

Tuesday, October 26, 2010

I will meet you yet again-Amrita Pritam




I will meet you yet again
How and Where?
I know not Perhaps
I will become a
figment of your imagination and
spreading myself
in a mysterious line
on your canvas
I will keep gazing at you
Perhaps I will become a ray
of sunshine to be
embraced by your colours
I will paint myself on your canvas
I know not how and where

But I will meet you for sure
Maybe I will turn into a spring
and rub the foaming
drops of water on your body
and rest my coolness on
your burning chest I know nothing else
but that this life
will walk along with me
When the body perishes
all perishes
but the threads of memory
are woven with enduring specs
I will pick these particles
weave the threads
and I will meet you yet again

-AMRITA PRITAM

Friday, October 8, 2010

बचेको जीवन

बचेको जीवन

समझी बस्छु अब कति छ मेरो भाग को ज़िन्दगी
कति छ मैले न भोगेको जीवन को परिहास
कति साथी छन मैले अझै पनी न भेटेको
कति वर्षा ऋतू छन मैले अहिले पनी न रुझेको
कति दृश्य छन न हेरेको
कति बाटो छन मैले न हिन्डेको
कति बिहान छ मैले उठ्नु पर्ने
कति रात छ मैले जागने
समझंछु अरु कति धर्मं छ बन्नू
कति बुद्ध छ जन्मिनु
कति आंखा छ रुनु
कति मन छ अझै बिज्नु
तरह मो यो पनि सम्झंछु कि
कोई त होला जसले मो जस्तै सोच्छ
या मो भन्दा राम्ररी वर्णन गर्छ
सफा-सीधा कुरा गर्छ
मो जस्तो भयभीत हुन्न
र सीधा सोध्ने हिम्मत छ त्यो संग
जसले हाम्रो भविष्य निर्धारित गर्छ
"भन मेरो भविष्य के हो"?
-narayan gautam (8th October'2010)